Tuesday, January 6, 2009

कैंसर - कुछ बातें - आभा सिंह

कैंसर का नाम सुनते ही लोग कांप जाते हैं और मान लेते हैं कि अब रोगी का अंत निकट है। मौत सुनिश्चित है पर यह सत्‍य नहीं है । यह सच है कि अन्‍य रोगों से यह बीमारी अलग है। पर आज बच्‍चों का कैंसर ठीक हो जा रहा है। अगर इसे समय से ईलाज कराया जाए और चिकित्‍सक के बताये रास्‍ते पर आदमी चले। इससे भागने की जगह उससे लडने की जरूरत है। आज हजारों लोग कैंसर से लडकर सामान्‍य जीवन जी रहे हैं। अक्‍सर लोग साधु-हकीम के चक्‍कर में फंस जाते हैं। पर सच्‍चाई है इस चक्‍कर में अधिकांश लोगों का कैंसर लाईलाज हो जाता है और तब लोगों को चिकित्‍सकों की याद आती है। और डाक्‍टर जवाब दे देते हैं। और मरीज मौत की गोद में अनजाने ही ठेल दिया जाता है। और उनके मन में यह बात बैठ जाती है कि कैंसर से मौत निश्चित है। कैंसर प्रभावित मरीज को जहां तक संभव हो उसे खुश रखने की कोशिश करें।
जब शरीर की कोशिकाओं का विभाजन अनियंत्रित हो जाता है तेा कैंसर की शुरूआत होती है। यह बीमारी महिलाओं में गर्भाशय में,स्‍तन में,पित्‍त की थैली और अमाशय में,मुंह में ,खून में व आंखों में कहीं भी हो सकती है।

Wednesday, November 26, 2008

कुछ करोगे तो नहीं लौटेगी बीमारी

न रिल्के की कविताएं
न रामशरणजोशी के लाल-नीले विश्वासघात
न इज़ाडोरा की प्रेमकथा
न स्वयंप्रकाश का इंधन
कुछ भी बांध नहीं पाता देर तक
एक झटके से आ-आ जाता है वह
हंसता-लड़ियाता
उसके सिर पर हाथ फेरत हूं मैं
देखो-तुम्हारे बाल फिर उगने लगे हैं
कितने सुन्दर हैं ये और मुलायम भी
पहले से भी ज्यादा
पेट से लगा भींचता
करीब-करीब उठा लेता हूं उसे
कि-पूछता है वह
पापा
बबलू की तरह
लौट तो नहीं जाएगी बीमारी

नहीं
नहीं लौटेगी बेटे
ऐसा है-कि कुछ करो
चित्र बनाओ या लिखो कुछ
अस्पताल के अपने मित्रों के बारे में
कुछ करोगे तो नहीं लौटेगी बीमारी

पापा-मैं क्रिकेटर बनना चाहता हूं
क्या-बेटे, यह भी कोई काम है
क्या ·· पापा
मम्मी कहती है डाक्टर बनो
और आप ........

Thursday, November 6, 2008

वक्‍त को गुजरने देना चाहिए - कुमार मुकुल

सोनू को भी दसवें साल के आरंभ में गांठ पड़ी थी। इसके बारे में सबसे पहले उसकी टीचर ने बताया था। फिर हैदराबाद हास्पीटल के इ एंड टी विभाग में दिखाया तो कुछ एंटी बायोटिक्स चलाया गया। पर ठीक होकर बीमारी पंद्रह दिन बीस दिन पर उभरने लगी? तब मैं खुद उसे होम्यो दवाएं देने लगा लक्षणों के आèाार पर। इस तरह साल भर हमने निकाल दिया। इसे होम्यो दवाओं का कमाल ही कहा जा सकता है कि साल भर वह गिनती की गोलियों से संभलता रहा।
यह सब चलता रहता अगर मेरे साइकियाटिस्ट गजलकार मित्र डॉ विनय कुमार को शंका ना होती और खुद पहल कर उन्होंने उसका एफएनएसी टेस्ट न कराया होता। टेस्ट रिपोर्ट में ही शंका को बल प्रदान कर बायोप्सी की सलाह दी गई थी। तब महावीर कैंसर संस्थान, पटना में गांठों से बायोप्सी का नमूना प्राप्त किया गया। ले-देकर रिपोर्ट भी आ गई और उस पर पक्की मुहर के लिए हमें मुंबई टीएमएच रेफर कर दिया गया।
शुरू में तो कुछ पता ही नहीं चलता था कि हो क्या रहा है? फिर स्थिति की गंभीरता समझ में आने लगी। अब-तक बारह-पंद्रह हजार रुपए पिता-भाई से लेकर खर्च कर चुका था। अब मैं और आभा जब भी अकेले पड़ते रोने लगते। सोनू के सामने पड़ते ही हम चुप हो बात बदलने की कोशिश करते अपने चेहरे छुपाने लगते। आर्थिक संकट में पारंपरिक भारतीय समाज का विचित्र व्यवहार सामने आने लगता है, सो आया।
स्वमूत्रपान मैं खुद उसे कराने लगा था। पर इस बीच गोमूत्र पान के लिए दबाव बढ़ाने लगा। खैर वह भी शुरू हो गया। ये चीज़ें बेशक फायद करती हैं पर ये घोषित कैंसर का इलाज थोड़े हैं ,कुछ लोग हरिद्वार जाने व किसी साधु को दिखाने की सलाह देने लगे। मुकेश प्रत्यूष (कवि) ने अपने किसी संबंधी की ऐसी गांठों का जर्राह दवारा चीर कर इलाज किए जाने का जिक्र करते जर्राह की अनुपलब्ध्‍ाता पर दुख व्यक्त किया। इस बीच बीमारी का सबसे बड़ा अटैक हुआ। गले के नीचे से लेकर आंखों तक पर सूजन और जलन का असर हुआ। इस बार सूरत बदली होने के चलते मैं भीतर से घबराया पर मेरे होम्योपैथ ने इस बार भी मामला संभालकर पुरानी स्थिति में ला दिया। पर सवाल था कब-तक। अभी पूरा डायग्नोज हुआ नहीं था और दवाएं सबकुछ तय होने के बाद ही चलतीं। तब-तक केवल मल्टी विटामिन की गोलियां चलाई जा रही थीं, महावीर संस्थान द्वारा।
अंत में विनय कुमार, कथाकार प्रेम कुमार मणि, पत्रकार अजय कुमार और ससुराल से मिली मदद को जुटाकर मैं मुंबई रवाना हुआ।
वहां पर बोनमैरो टेस्ट द्वारा पहली बार एएलएल का निवारण हुआ। दवाओं की चाटिंग हुई। तब-तक पता चल चुका था कि दो-ढाई लाख रुपए तो किसी भी तरह होने चाहिए तभी यहां इलाज कराया जा सकता है। जबकि कुल बीस-बाइस हजार रुपए लेकर चले थे हम। जब डाक्टर ने मामला साफ किया तो मेरा साला रोने लगा, वह भी साथ गया था? पर अब-तक मैं तैयार हो चुका था लंबी लड़ाई के लिए।
डाक्टर पारीख की असिस्टेंट ने मामला समझाया। पचास हजार रुपए हों तो इलाज शुरू किया जा सकता है, फिर आप व्यवस्था करेंगे? व्यवस्था,कौन सी व्यवस्था? मुझे लगा कि मुंबई का समुद्र अपार है, और इसका जल खारा, इसमें अपने दुखों की दाल नहीं गलेगी। दिल कड़ाकर हम लौट गए कि पटने में ही इलाज कराएंगे, दवाओं की चार्टिंग हो ही गई थी। लौटने की रात फिर बुखार चढ़ा। रो-धोकर फिर होम्यो दवा दी और सुबह तक बुखार उतर गया। अंग्रेजी दवाएं घोषित थीं पर ऐसा नहीं था कि बुखार आया तो आप उनमें से कोई दे दे। दवा आरंभ होने का खतरा पहले से ज्यादा बढ़ जाता, दवा विशेषज्ञों की निगाह में ही चलाई जा सकती थी।
इस बार पटना लौटा तो बात साहिित्यक हल्के में फैल चुकी थी। कुछ फोन भी आने लगे थे आश्वस्तिपरक। आखिरकार पत्रकारों-साहित्यकारों ने हजार-हजार रुपए चंदा किए। अरुण कमल, कर्मेन्दु शिशिर, सुरेन्द्र िस्नग्ध्‍ा, अनिल विभाकर, मदन कश्यप, श्रीकांत आदि ने विधान परिषद के अध्‍यक्ष जाबिर हुसैन से मदद की मांग की, जाबिर साहब ने सुनी भी। इससे पहले मैं उनसे मिला नहीं था। हां एक चिट्ठी आई थी `साक्ष्य´ के लिए और मैंने कविताएं भेजी थीं, जो छपी भी थीं
50 हजार के चेक के साथ उन्होंने एक पत्र भी सौंपा, जिससे जाहिर हुआ कि कभी उनकी माताजी भी कैंसर का शिकार हुई थीं।
इस बीच श्रीकांत-अजय से जानकारी मिलने पर अजय कुमार दवारा चलायी जा रही वेबसाइटबिहार टाइम्सडाटकाम पर भी सोनू की बीमारी की सूचना पढ़कर कुछ लोगों ने अमेरिका-इंग्लैंड-दुबई से हजार-पांच सौ से दस हजार तक की मदद भेजी। तब मैंने मुंबई की जगह दिल्‍ली का चुनाव किया। वह भी एम्स का। वह चुनाव सही साबित हुआ वरना सभी मुंबई जाने की सलाह दे रहे थे पर आर्थिक रूप से मुझे यह जगह उपयुक्त नहीं लग रही थी।
दिल्ली आया और एम्स में 15 दिन के भीतर अपनी जांच से संतुष्ट होकर डाक्टरों ने मुंबई की चाटिंग पर ही अपने हिसाब से दवा आरंभ कर दी। जारी ....

Monday, October 6, 2008

'वक्त को गुजरने देना चाहिए' - कुमार मुकुल



`आम की डालें बौर से भर जाती हैं
मैं गुनगुनाते हुए याद करता हूं
पिता का प्रिय गीत
ल्यूकीमिया में आखिरी सांस तक उन्होंने गाया था
हडि्डयों में कड़कते दर्द के बावजूद

वे गये चौवालीसवीं सालगिरह से पहले
एक गर्म दोपहर में
मौत के ठंडे आगोश की तरफ
रक्तहीन सफेद होते सपनों में लिपटे हुए

कुछ धीरज जरूरी होता है
खलाओं से निबटने के लिए
खला जब मौत की रची हो
वक्त को गुजरने देना चाहिए
यही किया मैंने
गो वक्त चींटी की रफ्तार से गुजरा
दिल पर हथौड़े, गिराता

(लोग पहचान लेते हैं-पंकज सिंह)

मौत की खलाओं से निबटता हुआ मैं भी वक्त को गुजार रहा हूं पिछले तेरह-चौदह महीनों से। अब तो लगता भी नहीं कि यह खला मौत की है, गो कि मौत की खला ही अब जीवन की बगिया बन गई हो।
यह एक दूसरी ही दुनिया है। इसमें चश्मे के पीछे से चमकती आंखों से सबका हाल-चाल टटोलतीं जापानी गुडिया सी सैंडिलें खटखटातीं फाइलों व मोटी किताबों का बोझ उठाए भागतीं बाल अर्बुद विज्ञान विभाग की सहायक आचार्य डॉ तुलिका सेठ हैं, डॉ नवीन हैं, कैंसर रोगियों की सहायता में लगीं संस्थाओं की ऊषा मैम, पूनम मैम, देवलीना मैम है और ढेर सारे बच्चे हैं, अधिकांश ब्लड कैंसर ग्रस्त। दुख तो बहुतों हैं सबके, पर उन्हें सबने जैसे अपने-अपने गांव पेठा दिया हो। क्योंकि वो रहेंगे तो पांवों की जंजीर ही बनेंगे और यहां तो मरने की भी फुरसत नहीं है। मौत आशिक है तो होवे, पर वो अब पहले सी मुहब्बत की मांग ना ही करे तो ठीक। क्योंकि यहां आंसुओं का खजाना अब लुटाया जा चुका है।
यहां माहौल ही दूसरा है। कवियों के कवि शमशेर के शब्दों में कहें-तो जहर का लेबल लगाए दवाएं यहां हंसती हैं और इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम हैं। कल ही सोनू से जब डॉक्टर ने पूछा-कोई कष्ट तो नहीं है तो उसने कहा कि क्या इन टेबलेटों (मेथाट्रेक्सटीन) की जगह सूईयां नहीं हैं। डाक्टर सेठ ने आश्चर्य से पूछा-क्यों, सूईयां तुम्हें अच्छी लगती हैं? सोनू का जवाब था-हां, मैम। एक साथ छह गोलियां निगलना ठीक नहीं लगाती दवा तीखी है, लगता है उल्टी हो जाएगी।
तो है न यह दूसरी दुनिया इधर कीमो थेरापी और रेडियो थेरापी से गंजे हुए सिर पर जब फिर बाल उगे और बड़ो हुए तो सोनू ने एक दिन कहा-पापा, मन होता है फिर सिर मुड़ा ले। कितना अच्छा रहता है, यह बाल झाड़ने-सिर धोने का झंझट खत्म।
रीतिका, रंणधीर, सोनू, दीपचंद, प्रदीप, विकास, अनू, अनुज, सविनय, रवि। ज्यादातर लड़के ही ब्लडकैंसर के मरीज हैं, मैंने एक दिन पूछा-डॉ सेठ से। यह बीमारी लड़कों को ही ज्यादा होती है क्या? तो कड़ी निगाह से देखतीं डॉ सेठ ने बताया कि, ऐसा अशिक्षा के चलते होता है, लड़के बीमार होते हैं तो उनके माता-पिता तुरत उस पर तवज्जो देते हैं, पर लड़कियों को लोग अनदेखा कर देते हैं। नतीजा किसी निष्कर्ष के ऊपर पहुंचने के पहले ही वो मौत के आगोश में चली जाती हैं और पता भी नहीं चलता कि उन्हें क्या बीमारी थी? यह भी एक हकीकत है।
यूं जान एस लिलेमैन की चाइल्उहुड ल्यूकेमिया पर पुस्तक के अनुसार लड़कों में ल्यूकेमिल का अनुपात लड़कियों से ज्यादा होता है। करीब 55 से 60 फीसदी लड़के ल्यूकेमिया से ग्रस्त होते हैं? यह एक कम पायी जाने वाली बीमारी है। ब्रिटेन में सर्वेक्षण के अनुसार 25000 में एक को ही यह महारोग ग्रसता है। ल्यूकेमिया की एक किस्म टीएएलएल के शिकार तो 80 फीसदी लड़के ही होते हैं।
ब्लड कैंसर (रक्त कर्कट) रक्त की सफेद कोशिकाओं का कैंसर है। इसे प्रतिरोधी व्यवस्था (इम्यूनसिस्टम) का कैंसर भी कहा जाता है। चूंकि बाहर से हुए इंफेक्शन का प्रतिरोध श्वेत रक्त कोशिकाएं ही करती हैं, इस बीमारी में वे ही मैलिंगनेट (कैंसरस) ग्रोथ करने लगती हैं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे ल्यूकेमिया कहा जाता है। ल्यूको मतलब सफेद रक्त होता है। इस शब्द का व्यवहार 19वीं सदी में श्वेत रक्त कोशिकाओं की ऐसी बीमारी के लिए हुआ था जिसमें इनकी अधिकता से व्यक्ति का रक्त मोती सा सफेद मामा लिए चमकीला हो जाता था।
एएलएल,एएमएल और ब्डस् कैंसर के तीन प्रकार हैं। इनमें पहले दो एक्यूट व तीसरा क्रोनिक कहा जाता है। तीनों समान रूप से खतरनाक होते हैं। एएलएल,एएमएल सामान्यत: बच्चों को होता है। इनमें बच्चे ज्यादातर एएलएल के शिकार होते हैं। ब्लड कैंसर के आरंभ में सामान्यत: गले की लिंफ नोड्स बढ़ने लगती हैं। गांठें पड़ जाती हैं। ज्वर भी आने लगता है कभी-कभार। आरंभ में अधिकांशत: इसे सामान्य इंफेक्शन या टांसिल का बढ़ना मान लिया जाता है। समयसे इलाज ना होने पर आगे नाक-गले से खून का आना शुरू हो जाता है। जारी ...