सोनू को भी दसवें साल के आरंभ में गांठ पड़ी थी। इसके बारे में सबसे पहले उसकी टीचर ने बताया था। फिर हैदराबाद हास्पीटल के इ एंड टी विभाग में दिखाया तो कुछ एंटी बायोटिक्स चलाया गया। पर ठीक होकर बीमारी पंद्रह दिन बीस दिन पर उभरने लगी? तब मैं खुद उसे होम्यो दवाएं देने लगा लक्षणों के आèाार पर। इस तरह साल भर हमने निकाल दिया। इसे होम्यो दवाओं का कमाल ही कहा जा सकता है कि साल भर वह गिनती की गोलियों से संभलता रहा।
यह सब चलता रहता अगर मेरे साइकियाटिस्ट गजलकार मित्र डॉ विनय कुमार को शंका ना होती और खुद पहल कर उन्होंने उसका एफएनएसी टेस्ट न कराया होता। टेस्ट रिपोर्ट में ही शंका को बल प्रदान कर बायोप्सी की सलाह दी गई थी। तब महावीर कैंसर संस्थान, पटना में गांठों से बायोप्सी का नमूना प्राप्त किया गया। ले-देकर रिपोर्ट भी आ गई और उस पर पक्की मुहर के लिए हमें मुंबई टीएमएच रेफर कर दिया गया।
शुरू में तो कुछ पता ही नहीं चलता था कि हो क्या रहा है? फिर स्थिति की गंभीरता समझ में आने लगी। अब-तक बारह-पंद्रह हजार रुपए पिता-भाई से लेकर खर्च कर चुका था। अब मैं और आभा जब भी अकेले पड़ते रोने लगते। सोनू के सामने पड़ते ही हम चुप हो बात बदलने की कोशिश करते अपने चेहरे छुपाने लगते। आर्थिक संकट में पारंपरिक भारतीय समाज का विचित्र व्यवहार सामने आने लगता है, सो आया।
स्वमूत्रपान मैं खुद उसे कराने लगा था। पर इस बीच गोमूत्र पान के लिए दबाव बढ़ाने लगा। खैर वह भी शुरू हो गया। ये चीज़ें बेशक फायद करती हैं पर ये घोषित कैंसर का इलाज थोड़े हैं ,कुछ लोग हरिद्वार जाने व किसी साधु को दिखाने की सलाह देने लगे। मुकेश प्रत्यूष (कवि) ने अपने किसी संबंधी की ऐसी गांठों का जर्राह दवारा चीर कर इलाज किए जाने का जिक्र करते जर्राह की अनुपलब्ध्ाता पर दुख व्यक्त किया। इस बीच बीमारी का सबसे बड़ा अटैक हुआ। गले के नीचे से लेकर आंखों तक पर सूजन और जलन का असर हुआ। इस बार सूरत बदली होने के चलते मैं भीतर से घबराया पर मेरे होम्योपैथ ने इस बार भी मामला संभालकर पुरानी स्थिति में ला दिया। पर सवाल था कब-तक। अभी पूरा डायग्नोज हुआ नहीं था और दवाएं सबकुछ तय होने के बाद ही चलतीं। तब-तक केवल मल्टी विटामिन की गोलियां चलाई जा रही थीं, महावीर संस्थान द्वारा।
अंत में विनय कुमार, कथाकार प्रेम कुमार मणि, पत्रकार अजय कुमार और ससुराल से मिली मदद को जुटाकर मैं मुंबई रवाना हुआ।
वहां पर बोनमैरो टेस्ट द्वारा पहली बार एएलएल का निवारण हुआ। दवाओं की चाटिंग हुई। तब-तक पता चल चुका था कि दो-ढाई लाख रुपए तो किसी भी तरह होने चाहिए तभी यहां इलाज कराया जा सकता है। जबकि कुल बीस-बाइस हजार रुपए लेकर चले थे हम। जब डाक्टर ने मामला साफ किया तो मेरा साला रोने लगा, वह भी साथ गया था? पर अब-तक मैं तैयार हो चुका था लंबी लड़ाई के लिए।
डाक्टर पारीख की असिस्टेंट ने मामला समझाया। पचास हजार रुपए हों तो इलाज शुरू किया जा सकता है, फिर आप व्यवस्था करेंगे? व्यवस्था,कौन सी व्यवस्था? मुझे लगा कि मुंबई का समुद्र अपार है, और इसका जल खारा, इसमें अपने दुखों की दाल नहीं गलेगी। दिल कड़ाकर हम लौट गए कि पटने में ही इलाज कराएंगे, दवाओं की चार्टिंग हो ही गई थी। लौटने की रात फिर बुखार चढ़ा। रो-धोकर फिर होम्यो दवा दी और सुबह तक बुखार उतर गया। अंग्रेजी दवाएं घोषित थीं पर ऐसा नहीं था कि बुखार आया तो आप उनमें से कोई दे दे। दवा आरंभ होने का खतरा पहले से ज्यादा बढ़ जाता, दवा विशेषज्ञों की निगाह में ही चलाई जा सकती थी।
इस बार पटना लौटा तो बात साहिित्यक हल्के में फैल चुकी थी। कुछ फोन भी आने लगे थे आश्वस्तिपरक। आखिरकार पत्रकारों-साहित्यकारों ने हजार-हजार रुपए चंदा किए। अरुण कमल, कर्मेन्दु शिशिर, सुरेन्द्र िस्नग्ध्ा, अनिल विभाकर, मदन कश्यप, श्रीकांत आदि ने विधान परिषद के अध्यक्ष जाबिर हुसैन से मदद की मांग की, जाबिर साहब ने सुनी भी। इससे पहले मैं उनसे मिला नहीं था। हां एक चिट्ठी आई थी `साक्ष्य´ के लिए और मैंने कविताएं भेजी थीं, जो छपी भी थीं
50 हजार के चेक के साथ उन्होंने एक पत्र भी सौंपा, जिससे जाहिर हुआ कि कभी उनकी माताजी भी कैंसर का शिकार हुई थीं।
इस बीच श्रीकांत-अजय से जानकारी मिलने पर अजय कुमार दवारा चलायी जा रही वेबसाइट
बिहार टाइम्सडाटकाम पर भी सोनू की बीमारी की सूचना पढ़कर कुछ लोगों ने अमेरिका-इंग्लैंड-दुबई से हजार-पांच सौ से दस हजार तक की मदद भेजी। तब मैंने मुंबई की जगह दिल्ली का चुनाव किया। वह भी एम्स का। वह चुनाव सही साबित हुआ वरना सभी मुंबई जाने की सलाह दे रहे थे पर आर्थिक रूप से मुझे यह जगह उपयुक्त नहीं लग रही थी।
दिल्ली आया और एम्स में 15 दिन के भीतर अपनी जांच से संतुष्ट होकर डाक्टरों ने मुंबई की चाटिंग पर ही अपने हिसाब से दवा आरंभ कर दी।
जारी ....